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ईंट गारे का था हमारा घर

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'042
फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन
ईंट गारे का था हमारा घर
आपने प्यार से सजाया घर
प्यार और स्नेह से इसे सींचा
पुष्प-पल्लव से है सजाया घर
दोपहर तक भले ही दूर रहे
शाम होते ही मन को भाया घर
शहर में होते हैं मकाँवाले
ख़ुशनसीबों ने सिर्फ पाया घर
दिन सुगन्धित किया समर्पण से
शाम को घर बनाया पूजा घर
जब मैं दफ़्तर उठा के लाता हूँ
मुझको लगता है अनमना सा घर
फ़र्क़ बाज़ार घर में कैसे हो
मैंने मंडी में ही बसाया घर
एक मुद्दत में हम बनाते हैं
ज़लज़ला पल में है गिराता घर
मुझको अफ्सोस नाम मेरा 'कँवल'
म्यूज़ियम में बदल न पाया घर