#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'144
मफ़ऊलु मुफ़ाईलु मुफ़ाईलु फ़ऊलुन
ठुकराओगे तो सोच लो पछताओगे बेशक पत्थर हूँ शिवालों में मुझे पाओगे बेशक उम्मीद की दुलहन हूँ निगाहों में बसा लो मंज़िल पे मेरे साथ पहुँच जाओगे बेशक तुम नींद में भी मुझ से जुदा हो नहीं सकते ख़्वाबों के दरीचों पे नज़र आओगे बेशक मुझको तो सज़ाओं की नहीं फ़िक्र मगर तुम ख़ुद अपनी ख़ताओं पे ही शरमाओगे बेशक पेट्रोल कि माचिस की ज़रूरत ही नहीं अब तक़रीरे-सियासत से ही जल जाओगे बेशक ख़ुशबू से मुअत्तर करूँ चाहोगे अगर तुम ज़ुल्फ़ों में मुझे गजरे- सा पहनाओगे बेशक मोदी वो हक़ीक़त है 'कँवल' दावा है मेरा
तुम जल्द ही दिल से उन्हें अपनाओगे बेशक