#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'228
मुजरिमों से मिले रह गए
होंठ मेरे सिले रह गए
बात दिल की न लब कह सके
मिल के भी बेमिले रह गए
मिट गईं जिस्म की दूरियाँ
रूह के फ़ासले रह गए
सच को सूली चढ़ाया गया
झूट के क़ाफ़िले रह गए
आप अब भी हसीं, मैं जवां
ख़्वाहिशों को गिले रह गए
जीतना हारना जीतना
क्या ग़ज़ब सिलसिले रह गए
है गवाही पे जब मुनहसिर
मुन्सिफ़ो ! फ़ैसले रह गए
मरहबा फ़ेसबुक ! मरहबा
दोस्ती के क़िले रह गए
वह मुझे भूल बैठे ‘कँवल’
इश्क़ के मरहले रह गए
सृजन 3 मई 2016
दैनिक भास्कर,पटना दिनांक 13 जून 2016 के साहित्य पृष्ठ 11 में प्रकाशित
यू ट्यूब पर डॉ. कमलेश हरिपुरी की आवाज़ में
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