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फूल की पंखडियों को मसलेंगे

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'205
फूल की पंखडियों को मसलेंगे
अजनबी बन के फिर वो चल देंगे
लफ्ज़ बैसाखियों पे थिरकेंगे
फ़िक्र रुसवाइयों से सह्मेंगे
तुम हमें भूल पाओगे शायद
हम भी तुम को भुलाना चाहेंगे
कोई पलटेगा जब वरक़ दिल के
सूखे टूटे गुलाब महकेंगे
तुम भी फ़ुर्सत में हम भी फ़ुर्सत में
आज आगे की बात सोचेंगे
धूप मेहमान बन के आयेगी
शबनमी घर बक़ा को तरसेंगे
तुम अगर हाँ नहीं में पूछोगे
हम ‘कँवल’ फिर जवाब कल देंगे
सृजन : 13 अप्रैल 2013
आकाशवाणी पटना से 17 दिसम्बर, 2018 को महफ़िल-ए-सुख़न में प्रसारित
हिंदी ग़ज़ल का बदलता मिज़ाज (पृष्ठ 96)