#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'240
फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
मेरे घर आई ख़ुशी
ख़ूब इतराई ख़ुशी
महफ़िलों के तंज़ से
काफ़ी घबराई ख़ुशी
ग़म के दस्तरख्वान पर
खा नहीं पाई ख़ुशी
अजनबी बर्ताव थे
जब भी घर आई ख़ुशी
मुफलिसों के ख़त कहाँ
पढ़ कभी पाई ख़ुशी
उलझनों के गाँव में
कब ठहर पाई ख़ुशी
गाँव का घर छोड़कर
फ्लैट में आई ख़ुशी
था बताशे का मज़ा
जब भी मुस्काई ख़ुशी
दिलबरों की बज़्म में
ढोल ले आई ख़ुशी
शौक़ से हमने 'कँवल'
बांटी घर आई ख़ुशी