#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'054
एक औरत ही आदम की तक़दीर थी
या हवस की गुफाओं की जागीर थी
हर कड़ी का बदन खौफ़ में क़ैद था
सच को जकड़े हुये एक ज़ंजीर थी
फ़र्ज़ की सूलियों पर मैं खामोश था
चार सू गूंजती मेरी तक़रीर थी
वक़्त ने म्यूजियम में सजाया मुझे
उसकी दीवारों पर मेरी तहरीर थी
आइनों के बदन पर दहकते हुये
पत्थरों की विवशता की तस्वीर थी
एक 'सारा शिगुफ्ता1 थी इक थे 'सईद2‘
जैसे रांझे की आहों मे इक हीर थी
क्या मुक़द्दर था परछाइयों का 'कँवल'
कोई दीवारो-दर थे, न तदबीर थी।