#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’267
फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन
रेत में कोई धार पानी की
है कहानी सराय - फ़ानी की
ख़ुदकशी के मुक़ाम से मैंने
ज़िन्दा रहने की तर्जुमानी की
उनकी गलियों में बेसबब गुज़रा
रायगाँ मैंने ज़िन्दगानी की
झूठ के पाँव थे उखड़ने पर
हार कर उसने हक़ बयानी की
हौसलों के महल हुए वीराँ
आग मद्धम हुई जवानी की
कोई राजा न कोई रानी है
कुछ अलग बात है कहानी की
क़ौल की है बहार जलसों में बात है सिर्फ़ गुलफ़िशानी की
कुछ न रक्खा ख़याल सेहत का
दूरियों की न क़द्रदानी की
मैं ‘कँवल’ से निबाहता कैसे
तल्ख़तर उसने ख़ुशबयानी की