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इक नशा सा ज़हन पर छाने लगा

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल' 038
इक नशा सा ज़हन पर छाने लगा
आपका चेहरा मुझे भाने लगा
चाँदनी बिस्तर पे इतराने लगी
चाँद बांहों में नज़र आने लगा
रूह पर मदहोशियाँ छाने लगीं
जिस्म ग़ज़लें वस्ल की गाने लगा
तुम करम फ़रमा हुए सद शुक्रिया
ख़्वाब मेरा मुझको याद आने लगा
रफ़्ता रफ़्ता यास्मीं खिलने लगी
मौसमे-गुल इश्क़ फ़रमाने लगा
ज़ुल्फ़ की खुशबु,शगुफ़्ता लब ‘कँवल’
मंज़रे – पुरकैफ़ दिखलाने लगा
सृजन : अगस्त 2005
प्रकाशन : वियाहुत सन्देश सितम्बर 2005
गोलकोंडा दर्पण : अप्रैल 2009
रेलवाणी : दिसम्बर 2015
डॉ. कमलेश हरिपुरी द्वारा यूट्यूब पर विडिओ अपलोड