#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'164
मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन
तेरी यादों के दस्तावेज़ अल्बम से निकल आए
मेरी पलकों पे शबनम के दिए सौ बार मुस्काए
तमन्नाओं की बस्ती में अजब दहशत वबा की है
जो परदेसी है क्या खाए, रहे घर में तो क्या खाए
कमाई बंद की मालिक ने, घर से हो गए बेघर
चले जब लॉक डाउन में पुलिस ने डंडे बरसाए
न कोई ट्रेन, बस या ट्रक, चले सब गाँव को पैदल
सियासत ने अजब ढॅंग से सज़ाएँ दीं ग़ज़ब ढाए
नगर में वन्य पशुओं के क़बीले सैर को निकले
घरों कमरों में वहशत खौफ़ के छतनार लहराए
हैं लटके चर्च, मंदिर,मस्जिदो- गुरुद्वारे पे ताले
कि ईश्वर, यीशु, गुरु, अल्लाह ख़फ़ा सारे नज़र आए
बदलकर रूप डॉक्टर नर्स थाने के जवानों का
मसीहा हॉस्पीटल में ये ख़ुद को सेवारत पाए
सभी गुरुद्वारों की है सेवाभावी रूप की शोहरत
ग़रीबों, दीन-दुखियों को ये गुरु लंगर बहुत भाए
लगे हैं मास्क चेहरों पर धुले हैं हाथ साबुन से ‘कँवल’ ने आज सैनीटाईजिंग के लाभ बतलाए