#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'202
पैरों में मेरे फ़र्ज़ की जंजीर पड़ी है
ए जज़्ब-ए-दिल1 ठहर बहुत सख्त घड़ी है
अब जन्मों के रिश्ते भी कहीं टूट न जायें
यूं अपनी वफ़ा फ़र्ज़ से इस बार लड़ी है
ज़ुल्फ़ों की घटा, आंख के खुम2, प्यार का बादा3
आगोश 4 मे आ जाओ लिये रात बड़ी है
तदबीर5 से जाग उठती है सोई हुई तक़दीर
तदबीर मुक़द्दर की वो खामोश कड़ी है
इक पल की खुशी को हैं तरसते कई युग से
कहते है 'कँवल’ उम्र-ग़मे-यार बड़ी है