#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'188
मुफ़ाइलुन मुफ़ाइलुन
ये ज़िन्दगी सवाब है
ग़म ओ ख़ुशी का बाब है
सवाल है जवाब है
जवानी मिस्ले आब है
है ख्वाब जो न मिल सका
मिला जो लाजवाब है
ग़मों का इज़्तराब तो
पलों का इंक़लाब है
कंटीले रेगज़ारों में
गुलों का इन्तख़ाब है
गली गली है मौत क्यों
बिके न जब शराब है
मिले त्रिवेणी जल कहीं
तो पुण्य बेहिसाब है
चला जो क्रूज़ गंगा में