#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'091
मफ़ऊलु फ़ाइलातु मफ़ाईलु फ़ाइलुन
गमले में तुलसी जैसी उगाई है ज़िन्दगी
पूजा है, अर्चना है, दवाई है ज़िन्दगी
किस ने कहा कि रास न आई है जिंदगी
हद दर्ज़ा सादगी से निभाई है ज़िन्दगी
मोबाइलों से सिर्फ़ सजाई है ज़िन्दगी
हमने ये किस तरह से गँवाई है ज़िन्दगी
जब से हुआ है प्रेम की ज़ुल्फों में क़ैद वो
उसके लिए ग़मों से रिहाई है ज़िन्दगी
शर्तों पे अपनी सबको नचाती रही है ये
कब दोस्तों की मुट्ठी में आई है ज़िन्दगी
शोहरत की धूप हमको मयस्सर नहीं हुई
बरगद के नीचे हमने बिताई है ज़िन्दगी
उसके बदन की खुशबू समेटे हुए हूँ मैं
मेरी भी रूह में तो समाई है ज़िन्दगी
उस्ताद की नसीहते-पुर-मा’नी याद हैं
‘अपने लिए नहीं है, पराई है ज़िन्दगी’
बाग़ों की तितलियों-सी लुभाती है ये ‘कँवल’
ख़ुशियाँ हैं यानी ग़म से जुदाई है ज़िन्दगी
सृजन 22 मई 2019