#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'212
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़े
बरसों बाद ज़मानत पर है आई ग़ज़ल
लाज से दोहरी हो गई है सकुचाई ग़ज़ल
जीवन के अनुभव को ढाल के शे'रों में
मंचों पर इस दौर में है इतराई ग़ज़ल
नुक्कड़ पर के चाय के संग बल खाती है
होटल में क़ालीनों पर घबराई ग़ज़ल
तुकबंदी की गलियों में हैं भटक रहे
पर दुष्यंत सी प्यारी कब हो पाई ग़ज़ल
शहरों के महंगे कोठों पर गुमसुम थी
चैन मिला निर्धन के घर जब आई ग़ज़ल
सागर मंथन करते रहती है हरदम
अमृतघट जो मिला हँसी, मुस्काई ग़ज़ल
कृष्ण 'कँवल' रहते हैं रथ पर गाइड जब
अर्जुन तब कह पाता है मनभाई ग़ज़ल
8 अक्टूबर,2022