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उलझनों की आंच में तपकर पयम्बर1 बन गये

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'048
उलझनों की आंच में तपकर पयम्बर1 बन गये
दर्दो-गम नदियों का पी कर हम समुंदर बन गये
दाग़े-लाला2 की तरह थे जब तलक सिमटे रहे
जब बिखर कर फैले हम बू-ए-गुले तर3 बन गये
यूं तो लिपटे हैं गमों के नाग हमसे दुख भरे
हम मगर खुश हैं कि चंदन का मुक़द्दर4 बन गये
आंख से ओझल हुये तो बिक गये जन्मों के मीत
प्यार के वादे थे जितने मोम के घर बन गये
मुझको तो बेचैन कर डाला समुंदर की तरह
खुद मगर मजबूरी-ए-साहिल का मंज़र5 बन गये
किस तरह होता फ़ना6 आखिर वजूदे - कहकशा7
टूट कर बिखरे भी हम तो माहो-अख्तर8 बन गये
सारी नजरों का 'कँवल' मरक़ज9 था अमृत का कलश
हम घड़ा विष का निगल कर भोले शंकर बन गये