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कोई दरवेश ये कह कर गया है

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'072
कोई दरवेश ये कह कर गया है
हमेशा एक सा दिन कब रहा है
गुलों पर हुस्न-ए-शबनम की क़बा है
इसी सूरत पे सूरज भी फ़िदा है
ज़माना देख कर हैरां हुआ है
तेरा ग़म मेरी पलकों पर सजा है
सहा है हम ने जो तुमने सहा है
मगर अंदाज़ अपना कुछ जुदा है
वो आये हैं लपेटे ज़िद की चादर
मेरे बिस्तर पे भी मेरी अना है
न उनके रूठने का वक़्त कोई
मनाने में हमें बरसों लगा है
न देखो शोर मज़हब की नज़र से
सेहत पर सबकी यह भारी पड़ा है
उदासी डाल कर बैठी है ख़ेमा
तबस्सुम एक क़िस्सा बन गया है
पहन कर आये हैं ग़ुस्से का जामा
ख़ुदाया घर में हंगामा मचा है
मेरा महबूब है बांहों में मेरी
“बहारों ने यक़ीनन कुछ कहा है”
कँवल पर रौशनी की मेहरबानी
भिवंडी में भी ग़ज़लें पढ़ रहा है
सृजन : मुंबई, 8 अक्टूबर 2017
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