#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'079
ख़्वाबों के दरीचों से न अब रूप दिखाओ
आओ मेरी आग़ोशे1-मुहब्बत को सजाओ
फागुन के महीने में तमन्नाओं के मेले
फिर ग़मकदा-ए-दिल2 मे लगे हैं चले आओ
मुस्तक़बिले- जर्रीं3 के ख़दो-ख़ाल4 संवारो इमरोज़ को माज़ी का न आइना दिखाओ
मैं कलियों के होटों पे हूं बिखरी हुई शबनम
ऐ वक़्त की किरनो, मेरा दामन न जलाओ
ऐसा न हो मैं बेच दूं हाथों में हविस के
आ जाओ सनम अपनी अमानत को बचाओ।
मैं आंखे बिछाये हुये रस्ते में खड़ा हूं
ऐ गुलबदनो , मुझसे यूं कतरा के न जाओ
हर हंसते हुये फूल के चेहरे पे लिखा है
देखो मुझे, लेकिन मेरे नज़दीक न आओ
ज़ख़्मों के चमनज़ार5 सजे हैं मेरे दिल में
ऐ देखने वालो मेरी सूरत पे न जाओ
हर चेहरा है इक काग़ज़ी गुलदान की सूरत
बेहतर है 'कँवल' तुम न इसे हाथ लगाओ