#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'234
मुफ़्त मिली पहचान नहीं हूं
मुंह मांगा वरदान नहीं हूं
साख़ है मेरी अपने दम पर
ग़ैरों का एहसान नहीं हूं
चहल-पहल है शाम की मुझसे
रात कोई सुनसान नहीं हूं
ख़ुशबू हूँ मैं ही जीवन की
ज़ुल्म का रौशनदान नहीं हूं
सब करते हैं मुझसे उलफ़त
नफ़रत का बाग़ान नहीं हूं
लोग भरोसा कर लेते हैं
सरकारी ऐलान नहीं हूं
झुंझलाऊं आईने पर ही
इतना भी नादान नहीं हूं
घर मेरा,घरवाला हूं मैं
घर आया मेहमान नहीं हूं
इतराता हूं बादे सबा सा
आंधी या तूफ़ान नहीं हूं
इज़्ज़त करता हूं औरत की
मैं कोई हैवान नहीं हूं
ठेस लगे, एहसास नहीं हो
इतना भी बेजान नहीं हूं
लोग समझ पाये नहीं मुझको
मैं भी 'कँवल' आसान नहीं हूं
सृजन 7 मार्च 2018 (64)