#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’273
लम्स1 की आंधियों से जो डर जायेंगे
क़ुर्ब2 के सारे मंजर3 बिखर जायेंगे .
रात दरबान बन कर रहेगी मगर
दिन निकलते ही ख़्वाब अपने घर जायेंगे .
सांसों के डूबते उगते सूरज लिये
उम्र की सरहदों से गुज़र जायेंगे .
जिस्म की रिश्वतें देंगे बरसात को
फिर नये पत्ते लाने शजर जायेंगे .
उसकी यादें न कर दर बदर ऐ 'कँवल'
बे ठिकाने ये मंज़र किधर जायेंगे .