#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'180
दुज़दीदा निगाही से नहीं कोई शिकायत
हालत की राहों में लुटे अहल-ए-मुहब्बत
ऐ देखने वालो ! ये मेरी सादगी देखो
क़ातिल से भी रखता हूँ मैं उम्मीद-ए-इनायत
अंजान था हर शख्स कहानी से हमारी
हासिल हुई तुझसे ही हमें अज़मत ओ शोहरत
यादों की महकती हुई जंज़ीर-ए-तिलाई
पहने हुए है आज भी नाकाम मुहब्बत
अफ़साना सुहाना है ‘कँवल’ इश्क़ का लेकिन
कुछ भी नहीं इस राह में जुज़ अश्क-ए-नदामत
सृजन : 23 अगस्त 1974
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