#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'049
उलझनों के गांव में दुश्वारियों का हल भी है
ज़हन की ख़ामोशियों में शहर की हलचल भी है
क़ुरबतों की धूप पर अहसास का बादल भी है
सुर्ख़िये-ए-आरिज़ की ज़द पर आंख का काजल भी है
इक मुजस्सम हुस्न की रानाइयों का शोर है
जिस्म के भूगोल पर इतिहास का मलमल भी है
झील सी आँखें, दमकते होंट, जु़ल्फें दोश पर
शाख पर नाज़ुक बदन के एक वर्जित फल भी है
तय हुआ गंगोत्री से पाक गंगा का सफ़र
अब प्रदूषण के नगर में शुद्ध गंगा जल भी है
खाक कर डालेंगे भ्रष्टाचार के जंगल को हम
देशहित की भावना है मन में नैतिक बल भी है
देख 'सावन का 'कँवल' है मरकज़े-अहले-नज़र