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है बात जब कि जलती फ़ज़ा1 में कोई चले

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’310
है बात जब कि जलती फ़ज़ा1 में कोई चले
बरसात में तो नाला भी बन कर नदी चले
औरों को हमने खंदालबी2 बांट दी मगर
खु द अपनी चश्मे-शौक़ मे लेकर नमी चले
इक जाम और पी लें सरे राहे जिंदगी4
ठहरो ज़रा रफ़ीक़ो5 कि हम भी अभी चले
तुम से बिछड़ के मैं न कभी चैन पा सका
तुम क्यों मुझे भुला के मेरी जिं दगी चले
सूरज की घूप से कभी सूखी नहीं नदी
फिर क्यों न ग़म में हंसते हुए आदमी चले
ये बेवसी कि ज़ख़्म दिखाना भी है गुनाह
अच्छा चलो ये साजिशे-अगियार6 भी चले
बिखरी हुई हयात7 समेटूंगा मै 'कंवल’ शायद इसी से कार गहे-जि़ंदगी चले
1. वातावरण 2. होटों की हंसी 3. पे्रम नयन 4. जीवन की राह में