#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'096
फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ैलुन
गुलबदन पर निखार का मौसम
जोश में है बहार का मौसम
फूल पत्ती पे प्यार का मौसम
खो गया इख़्तियार का मौसम
आप आए तो हो गयी तस्दीक संपुष्टि
लुट गया इंतज़ार का मौसम
आई फ़स्ले-बहार तो देखा
ग़म पे नाज़िल फ़रार का मौसम
मुफ़लिसी में कहाँ ठहरता है
मर्द के एतबार का मौसम
ये बजट ले उड़ा ग़रीबों से
उनके सब्रो- क़रार का मौसम
अपने सूबे में दरबदर है 'कँवल'
मय को तरसे ख़ुमार का मौसम