#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'052
उसको चिंता रहती है बस अपने मान और शान की
कभी नहीं सोचा जो सम्मुख हैं उनके सम्मान की
मंचों से उपदेश दिए सुन्दर,मोहक पर ख़ुद अपने
जीवन में ही नहीं उतारा बात कोई भी ज्ञान की
कब उपकार किये अपनों ने फूल दिए हैं कब बोलो
फिर आरोप के पत्थर क्यों पेशानी पर अनजान की
झरने, नदियाँ, बाग़-बगीचे, फूल सुगन्धित, मीठे फल
जय भारत माता की ! जय ! जय धरती हिंदुस्तान की
देश विदेश के धनवानों ने अति धन अर्जित कर समझा
सुख-संपत्ति, धन - वैभव हैं वस्तु निरंतर दान की
चहको व्हात्सप,ट्विटर पर या फ़ेसबुक पर मगन रहो
यही सनद है बची सुरक्षित कवियों के उत्थान की
नाम,प्रतिष्ठा, पद,मर्यादा,हवा ले उड़ी इक पल में
‘कँवल’ अतिथि हैं ये जीवन के वस्तु नहीं अभिमान की
सृजन : 24 अप्रैल, 2016