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काबे से निकल के भी हैं इक काबे के अंदर

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल' 065
काबे से निकल के भी हैं इक काबे के अंदर
सीने से लगाये हमें है काशी के मंदिर
ऐ बुतशिकनो ! महवे-तवाफ़1 आज हो क्यो कर
जब संग2 था इक रोज वो दिलकश फ़ने-आज़र3
आमादा-ए-हक़गोई4 न कर दे ये तगाफ़़ुल5
ऐसा न हो बन जाये तेरी राह का पत्थर
बरसो जो बियाबां6 पे तो हो जि़क्रे-इनायत7 मोहताजे-करम 8 तो नहीं लहराते समन्दर
आ जा भी कि बरसात के अब आखि़ारी दिन हैं आंखों में लरज़ते हैं तेरे वस्ल 9 के मंज़र10
करते है 'कँवल' जो तेरी मिदहत11 तेरे मुंह पर
वो लोग चुभोते हैं तेरी पीठ में खंजर