#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’309
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन
हैं अपने सम्बन्ध यथावत
पीर का है अनुबंध यथावत
टूट गयी रिश्तों की डोरी
साँसों की सौगंध यथावत
उमड़ पड़े गरिमा के बादल
गंध सुगंध प्रबंध यथावत
खुशियों की दीवार गई ढह
रिश्तों का तटबंध यथावत
काँटों में सख्ती है अभी भी
फूलों में है गंध यथावत
बाज़ू में भुजदंड की रौनक
चाल में है कटिबंध यथावत
आयु क्रमांक शतक चौखट पर
मन से 'कँवल' कामांध यथावत