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मजदूरों के लिए कोई लारी न आएगी

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'224
मफ़ऊलु फ़ाइलातु मफ़ाईलु फ़ाइलुन
मज़दूरों के लिए कोई लारी न आएगी
बस ट्रेन जैसी कोई सवारी न आएगी
कुछ फ़ासला हो, हाथ मिलाएं नहीं कभी
करोना जैसी कोई बिमारी न आएगी
शमसान क़ब्रगाह के मंज़र तबाह हैं
औलाद मैयतों पे तुम्हारी न आएगी
सरकारी हुक्म मानेंगे गर एहतियात से
तो देखिएगा मौत की आरी न आएगी
महफ़ूज़ घर में आप रहेंगे अगर ‘कँवल’
मैं मुतमइन हूँ आपकी बारी न आएगी
17 मई,2020
यह समय कुछ खल रहा है (ग़ज़ल @लॉक डाउन)