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जो पागल कर दे वो अंगड़ाइयां हैं - Copy

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'131
जो पागल कर दे वो अंगड़ाइयां हैं
कहीं ख़य्याम की चौपाइयां हैं
मेरे सामर्थ्य और साहस के पीछे
तेरे सौन्दर्य की कुछ तितलियाँ हैं
लगन में है उंचाई पर्वतों की
समुन्दर की तरह गहराइयां हैं
तुम्हारे साथ हैं मधुमास के पल
मेरे संग पीर की पुरवाइयां हैं
मेरे अधरों पे हैं बिरहन के दोहे
तुम्हारी हर तरफ़ शहनाइयां हैं
न मिलता है, न सुध लेता है बेटा
कुशल पूछे कोई तो बेटियाँ हैं
बुढ़ापे में अकेलापन,हताशा
हमारे युग की कुछ उपलब्धियां हैं
तुम्हारे साथ है महफ़िल की रौनक़
हमारे साथ बस तनहाइयां हैं
सियासत अप्सरा बन झूमती है
फ़िज़ा में रिश्वती पुरवाइयां हैं
सदी की नेकनामी,ख़ुशख़याली
गुज़श्ता लम्हों की परछाइयां हैं
कमल खिलने की इच्छा है सभी की
‘कँवल’ इस झील में पर काइयां हैं
सृजन 18 अक्टूबर,2015
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