#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल' 066
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ाअ
काली रात का टीका चाँद
उजला उजला पीला चाँद
रफ़्ता रफ़्ता घटता चाँद
पूरा, पौना, आधा चाँद
दुख के पर्वत लांघ गया
सुख की झील में उतरा चाँद
भूखे बच्चे की ख़ातिर
रोटी का इक टुकड़ा चाँद
राधा के मन भाता है
मोहन जैसा प्यारा चाँद
रूप पे अपने गर्व करे
तन कर हरदम रहता चाँद
बांछें खिल गईं निर्धन की
आँगन में जब उतरा चाँद
यौवन कलश दिखाने को
दर्पण दर्पण भटका चाँद
चाँदनी से अभिसार करे
बादल से छन बहका चाँद
हंसुली, कंगन बन के 'कँवल'