#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’256
ये सच है कि सर धड़ से मेरा दूर हो गया
पर मैं भी तो सच बोल के मंसूर हो गया
जो तुमने दिया ख़्वाब-ओ-ख़यालात का तोहफ़ा
ग़ज़लों में मेरी ढल के वो मशहूर हो गया
सब ख़्वाब मेरे खो गए यकलख़्त उसी पल
जब मेरे तसव्वुर से भी तू दूर हो गया
सन्नाटा था पसरा हुआ तन्हाई थी हायल
आप आये तो घर झूमा ,मैं मख़्मूर हो गया
मुझ पर जो फ़क़ीरों के इनायात-ओ-करम थे
सुल्तान भी दर पर मेरे मजबूर हो गया
सृजन : 15 अप्रैल 2013
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