#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'208
मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन फ़ऊलुन
बड़ी आसान क़िस्तों में चुका है
तमन्नाओं की बस्ती में रहा है
वफ़ा मजबूर लोगों की बना है
लिबासे - बेबसी में दीखता है
दवाओं की तिजारत कर रहा था
दुआओं की हिफ़ाज़त पर टिका है
बला की चन्द साँसों से उलझ कर
बदन अकड़न की सरहद पर रुका है
किया है जिस्म मुंशी के हवाले
किसी को भात पानी तब मिला है
जमी है पाउडर की पर्त रुख पर
कहाँ आईने को ये सब पता है
'कँवल' आसां हुआ है पद्मश्री अब
सभी को ऑनलाइन मिल रहा है