#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'145
मफ़ऊलु फ़ाइलातु मफ़ाईलु फ़ाइलुन
ठोकर में डाल कर ये ज़माने की दौलतें
मैं छोड़ आया दूर वज़ारत की शोहरतें
बारिश की रात में कोई दहका गया मुझे
चिंगारियां बनी हैं अभी उसकी चाहतें
कमज़ोर होगा ऐसे ही भारत महान ये
हमको लड़ाने पे तुलीं बैरूनी ताक़तें
सच है कि उनके साथ रहे उम्र भर मगर
मुझको कभी भी भायीं नहीं उनकी आदतें
उनकी निगाह में था ज़रो-माल अशर्फ़ी
मुझको पसंद आईं फ़क़ीरों की सोहबतें
कैसे किताबे- दिल पढ़े कोई भी कम नज़र
नूरानी कैफ़ से हों बड़ी जब ज़रूरतें
था हौसला बुलंद हर इक सूबे में 'कँवल'
अब फ़ौज में भी आ गयीं भारत की औरतें