#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल' 062
फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ेलुन फ़ाअ
करता आया अब तक पाप
कैसे होगा पश्चाताप
मेरी इक चुप हायल थी
व्यर्थ रहा उसका आलाप
देश तरक्क़ी में मशरूफ़
महंगाई का व्यर्थ विलाप
सुख के बादल बरस गए
ख़त्म हुआ मन का संताप
थक कर चूर हुआ सागर
ग़म की गहराई को माप
बातचीत में खोए हैं
दो निर्मल मन शुद्ध प्रलाप
लगते थे आसान 'कँवल'
कितने जटिल मगर थे आप