#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’013
अभी तक हैं दर-ए अहसास पर लम्हे गिरां कितने
तरसते रह गए मरहम को ज़ख्म-ए-जाविदां कितने
गुलिस्तानों में होते हैं गुल-ए-आतिश फ़िशां कितने
सितम है ख़ुद ही बन जाते हैं गुलचीं बाग़बां कितने
मैं लेकर पारा पारा ज़िन्दगी कब तक फिरूं तनहा
बता ऐ दुश्मन-ए-जां अब हैं तेरे इम्तहां कितने
न जाने क्यूँ मेरी क़िस्मत में हैं तारीकियां इतनी
अगरचे उनके दामन में हैं माह ओ कहकशां कितने
निकल आने दो यारो वक़्त का सूरज घटाओं से
हमें भी देखना है वह रहेंगे बदगुमां कितने
जो मिलता है वो हाथों में लिए पत्थर ही मिलता है
हजूम-ए-मेहरबां में भी हैं ये नामेहरबां कितने
‘कँवल’ फ़स्ल-ए-ख़िज़ाँ का मुझ पे ये अहसान है वर्ना
बहारों में बिखर कर रह गए हैं गुलसितां कितने
सृजन 22 अप्रैल,1974
साप्ताहिक मोर्चा,गया 19 अक्टूबर 1974 में प्रकाशित