#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'203
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
रामभज रामभज रामभज
फ़्लैट पर धूप आती नहीं
बाल धोये सुखाती नहीं
जब सुना गुनगुनाते उन्हें
कोई शय अब लुभाती नहीं
कुछ झिझक मिलने में है उसे
बेधड़क पास आती नहीं
हक़ बयानी की हिम्मत कहाँ
बात झूठी भी भाती नहीं
रहनुमाओं की तक़रीर अब
भाई चारा बढ़ाती नहीं
ख़्वाहिशें इतनी दिल की बढीं
कोई दुल्हन-सी भाती नहीं
लफ़्ज़ की धूप और छाँव बिन
शायरी रास आती नहीं
वंचितों को बिना कुछ दिए
ज़िन्दगी मुस्कुराती नहीं
क़ौम की मुश्किलें कब 'कँवल'
ये सियासत बढ़ाती नहीं
21 जनवरी,2022