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टूटे हुये तारे का मुकद्दर हूं सद1 अ फ़्सोस2 - Copy

रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'143
टूटे हुये तारे का मुकद्दर हूं सद1 अफ़्सोस2
पतझड़ के किसी पेड़ का मंज़र हूं सद अफ़्सोस
तिनके का सहारा भी न था चाह के फिर भी
मैं डूब न पाया कि शनावर3 हूं सद अफ़्सोस
मुमकिन नहीं छूना मैं संवारू इन्हें कैसे
आर्ईनों के इक ढ़ेर पे आज़र4 हूं सद अफ़्सोस
काम आके मेरे हो गये बेकार सभी गुल
मैं जैसे किसी देवी का मंदिर हूं सद अफ़्सोस
पैमाने में भी झील सी आंखें उभर आईं
सच है कि तमन्नाओं का महशर5 हूं सद अफ़्सोस
तुम प्रीत की राहों में रहे शबनमी चादर
मै आज भी इक मील का पत्थर हूं सद अफ़्सोस
गंगा नहीं आती है 'कँवल’ मिलने को मुझसे
तन्हाई का बेचैन समुंदर हूँ सद अफ़्सोस