#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'133
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
जो समर्पित थे कल तक बदलने लगे
वक़्त बदला तो ज़हर अब उगलने लगे
शबनमी घास का हुस्न बेकल हुआ
सर्द पत्तों पे बादल मचलने लगे
मतलबी दौर है खुद गरज़ है फ़िज़ा
लोग पाला पे पाला बदलने लगे
बात करने में कोई मज़ा न रहा
बेअदब बदजुबां लोग खलने लगे
वक़्त कम है मगर काम तो कम नहीं
सोच कर हम उसूलों पे चलने लगे
साहबों की हथेली में खुजली हुई
नोट फ़ाइल में खुद ही उछलने लगे
होटलों में 'कँवल' प्लेट मलते हुए
देख बचपन नयन द्वय पिघलने लगे