#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'123
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल
जिसे हमने फेंका उठाया भी है
ग़रीबी ने ये दिन दिखाया भी है
न इंसानियत की है इज्ज़त कोई
सियासत ने हमको बताया भी है
कहाँ लम्स तेरा भुला पाया मैं स्पर्श
कई मौसमों ने लुभाया भी है
न दिखला सका मेरे मन-सा मुझे
कि सोने से दर्पण सजाया भी है
कभी मैंने ख़ुद को न कमतर कहा
मेरा मशविरा काम आया भी है
शिवालों के बाहर कि भीतर खड़ा
कटोरा हर इक शख़्स लाया भी है
सभी राम के ध्यान में हैं 'कँवल'
अयोध्या ने सबको बुलाया भी है
14 जनवरी, 2022