#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’294
फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़ऊलुन फ़अल
सितारों भरा जग दुलारा गगन
तमन्ना-ए-दिल ने उतारा गगन
हसीं आरज़ू ने उभारा गगन
ख़ुलुसो-वफ़ा से पुकारा गगन
ज़मीं गुलशने-अम्न की रम गयी
महकने लगा माह्पारा गगन
मुक़र्रर है दो ग़ज़ ज़मीं आपको
तलाशें न अब रब को प्यारा गगन
न है जुस्तजू-ए- ज़रो-सीम की
फ़क़ीरों का है इक सहारा गगन
छटी ग़म की बदली जो वो मिल गए
हुआ पल में ही आशकारा गगन
'कँवल' इन दिनों हैं अदू रंज में
दिए जा रहा है ख़सारा गगन