• May 20, 2021

ग़ज़ल — रमेश ‘कँवल’

ग़ज़ल — रमेश ‘कँवल’

ग़ज़ल — रमेश ‘कँवल’ 150 150 Ramesh Kamal

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन

 

उसकी सारी ख़ूबियाँ ख़ुद जलवागर करता रहा

उसके ख़्वाबों से मैं नींदें तरबतर करता रहा

 

हो गया एहसास जब कुछ भी नहीं बाक़ी रहा

दस्तख़त पर दस्तख़त मैं बेहुनर करता रहा

 

लम्हा लम्हा वो झलकता ही रहा स्क्रीन पर

मैं भी मोबाइल से उसको दरबदर करता रहा

 

ख़त मुसलसल उसको लिखने की मेरी आदत रही 

दिल के डेटाबेस में वह उनको घर करता रहा

 

किरची किरची ख़्वाहिशें आँखों में चुभती थीं ‘कँवल’ 

ज़िक्र हाये दर्दे-उल्फ़त हमसफ़र करता रहा

 

20 अक्टूबर, 2020