#ग़ज़ल@रमेश ‘कँवल’018
फ़ाइलुन मफ़ाइलुन मफ़ाइलुन मफ़ाइलुन
212 1212 1212 1212
हम विसाले- यार का जमाल देखते रहे
आँखेँ, ज़ुल्फ़े, होंठ और गाल देखते रहे
योग से निरोग का कमाल देखते रहे
चैनलों पे योगी का धमाल देखते रहे
जो उफ़क पे मौज-मस्ती में रहे रवां दवां
हम ज़मीं पे उनको ख़स्ता हाल देखते रहे
बन सँवर के आ गया वो रूपवान बाम पर
हम भी उसके हुस्न की मशाल देखते रहे
अंजुमन जो एक दिन उरूज पर था दोस्तो
एक शख्स आया क्या जवाल देखते रहे
रह गए हदे-जुनून के मुग़ालते में हम
वे लबे-शऊर के सवाल देखते रहे
पंछियों के झुण्ड रुक न पाए शहरे नाज़ में
धूल धूसरित तलैया ताल देखते रहे
धर्म की किताब में न जाने क्या लिखा मिला
ख़ूने- शहर में जो सब उबाल देखते रहे
हम 'कँवल' फ़िदा हुए यूँ उनके हाव-भाव पर
आईने में उनके ख़द्दो-ख़ाल देखते रहे