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रमेश 'कॅंवल' की दिलकश ग़ज़लें

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मुहब्बतों का शायर : रमेश 'कॅंवल'
#ग़ज़ल@रमेश 'कँवल'029
फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
राम भज रे राम भज
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दिल का जब दफ़्तर खुला
हसरतों की लौ बुझी
चाह का परचम झुका
ख्वाहिशें बढती गयीं
आदमी का क़द घटा
ग़म का कुछ सामान कम
मेरी आँखों में मिला
ढूँढता हूँ सुब्ह से
शाम की रंगीं फ़िज़ा
बे - सलीक़ा बे - हुनर
है तिजारत इक सज़ा
भीड़ की आँखों में वो
ढूँढता अख़लाक़ था
लूटकर मस्ती - ख़ुशी
तोड़ बैठे दिल मेरा
दे न पाए वो 'कँवल'
मेरी ख़िदमत का सिला