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हमें क़र्ज़ ग़म के चुकाने बहुत हैं - रमेश 'कँवल'

2025 की ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’64
हमें क़र्ज़ ग़म के चुकाने बहुत हैं
तबस्सुम के सूरज उगाने बहुत हैं
उदासी के लब पर तराने बहुत हैं
निगाहों में मौसम सुहाने बहुत हैं
कथा आस्था की करोड़ों अधर पर
सनातन के क़िस्से पुराने बहुत हैं
बहुत भीड़ है ट्रेन में फिर भी देखो
त्रिवेणी पे आये नहाने बहुत हैं
बहुत सुन लिया दास्ताने-ग़मे-दिल
ख़ुशी को भी क़िस्से सुनाने बहुत हैं
बहुत कोशिशें की उन्हें भूलने की
मगर ख़्वाब उनके सुहाने बहुत हैं
तरक़्क़ी की राहों पे बढ़ने की धुन में
'कॅंवल' ज़ख़्म हमको छुपाने बहुत हैं
सृजन : 28 जनवरी,2025
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