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लब के पोशाक जो रँगीले हैं- रमेश 'कँवल'

2025 की ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’58
लब के पोशाक जो रँगीले हैं
गुफ़्तगू के हसीं वसीले हैं
कुम्भ मेले में धूम है जिसकी
उस पहाड़न के वेष ढीले हैं
वाइरल हो गई है जो लड़की
होंठ उसके बड़े रसीले हैं
सब उतारू हैं मुफ़्त देने पर
राहबर देश के हठीले हैं
अब हुकूमत भलाई पर है तुली
हर तरफ़ रोशनी के टीले हैं
यूं सनातन की चल रही है हवा
हर जगह जश्न के क़बीले हैं
हाँ ! कँवल' के हुए हैं पौ-बारह
हाथ खुशियों के आज पीले हैं
सृजन - 22 जनवरी,2025
फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन