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रहबरों की मस्तियाँ - रमेश 'कँवल'

2025 की ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’57
रहबरों की मस्तियाँ
सोचती हैं कुर्सियाँ
अब न आतीं चिठ्ठियाँ
खो गई हैं हिचकियाँ
सारी नदियों का वजूद
सोख लेंगीं किश्तियाँ
नभ हो,जल,आकाश हो
कम कहां हैं नारियाँ
शुद्ध कोई तो करे
घुट रही हैं नद्दियाँ
सूर्यघर में मुफ़्त में
बिजली की है बस्तियाँ
चाँद का दिलकश सफ़र
हो रही तैयारियाँ
सीख मां, दादी को अब
दे रही हैं बेटियाँ
जग में हैं कुछ लोग जो
कर रहे हैं नेकियाँ
अब परीक्षा के लिए
फ़ालतू हैं पर्चियाँ
वेदना माँ की ‘कँवल’
कह रही हैं झुर्रियां
सृजन : 15 मार्च, 2024
फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
जी. एस. के. शिष्ट विनोद, दानापुर,पटना अंक 46 पृष्ठ 23 पर प्रकाशित