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मुश्किलों में सँवर गया कब का - रमेश 'कँवल'

2025 की ग़ज़लें

Translation

#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’73
मुश्किलों में सँवर गया कब का
हार का दर्द, डर गया कब का
कल्पनाओं का घर था शोकाकुल
नेह संबंध मर गया कब का
इतनी खुशियाँ हमारे घर आईं
ग़म का दरिया उतर गया कब का
हुक्म तो दी उड़ान भरने की
पंख लेकिन कतर गया कब का
हौसलों की उड़ान की थी खुशी
दिल से हर एक डर गया कब का
बाग़बाँ की थी परवरिश ऐसी
फूल खिल कर बिखर गया कब का
ज़ख्म पर ज़ख्म खाए इतने 'कँवल'
दर्दे-दिल का असर गया कब का
सृजन - 23 नवंबर, 2025
फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़ेलुन