#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’56
मेरे दिल में हमेशा से बसी है
वही सूरत जो ख़्वाबों में सजी है
इशारे मिल रहे हैं उसके दर से
दरीचे पर वो शहज़ादी खड़ी है
खुला है बाद मुद्दत के वो मुझसे
गली में उसकी इक खिड़की खुली है
मेरी आंखें भुला बैठीं हैं रोना
उदासी मेरे चेहरे पर सजी है
मुझे हॅंसने कहां देती है दुनिया
मेरे हिस्से में क़िस्मत क़ैस की है
गिराने की है कोशिश में वो हरदम
मेरे हमराह हिम्मत की नदी है
तेरी यादों के मेकअप रूम में हूं
‘कँवल' जोबन पे मेरी शायरी है
सृजन : 23 फ़रवरी,2025 (रविवार)
मफ़ाईलुन मफ़ाईलुन फ़ऊलुन