#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’74
मेरी उस से कभी बनी ही नहीं
उसको मंज़ूर दोस्ती ही नहीं
उसने उलफ़त क़बूल की ही नहीं
उसकी क़िस्मत में आशिक़ी ही नहीं
उसके होंठों पे है वफ़ा रौशन
उसके लहजे में बेरुखी ही नहीं
साथ रहता है हमनफ़स की तरह
वो मेरा दोस्त अजनबी ही नहीं
जिसको चाहा था उम्र भर दिल से
मेरी पर्वा उसी ने की ही नहीं
जिसके दम से है ये जहाँ रोशन
उसके चेहरे पे रोशनी ही नहीं
जिसकी बातों में शायरी थी ‘कँवल’
उसके जीवन में अब खुशी ही नहीं
सृजन - 10 नवंबर, 2025
फ़ाइलातुन मफ़ाइलुन फ़इलुन
यानि अपनी तो ज़िंदगी ही नहीं