#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’50
बे मक़ासिद ज़िंदगी अच्छी नहीं
शेरियत बिन शायरी अच्छी नहीं
आपकी ये बरहमी अच्छी नहीं
कद्रदां से बेरुखी अच्छी नहीं
रौशनी हो मेहरबाँ हम पर सदा
चार दिन की चाँदनी अच्छी नहीं
दिल चटखने की सदा हो अनसुनी
ज़ह्न की ये सादगी अच्छी नहीं
मिसरों के सँग नाम शायर का न हो
बात 'रचनाकार' की अच्छी नहीं
देशहित में सब सियासत कीजिये
देश से ये दुश्मनी अच्छी नहीं
शहर में अच्छी कमाई हो रही
गाँव की ये मुफ़्लिसी अच्छी नहीं
राब्ता बंदों से ग़ायब है 'कँवल'
आपकी ये बंदगी अच्छी नहीं
सृजन - 25 अगस्त,2025
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन