#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’48
पैरहन वादों के लहराए बहुत
हुस्न के झांसे में हम आए बहुत
नासमझ हमको समझते तुम रहे
हम तुम्हें लेकिन समझ पाए बहुत
जिस्म पर मदहोशियां छाने लगीं
रूह को खुशियों के सरमाये बहुत
ज़ख्म आजादी के फिर ताज़ा हुए
मज़हबी उन्माद याद आए बहुत
एक ही मज़हब पड़ोसी मुल्क में
दूर हैं पर अम्न के साये बहुत
दूर गाज़ा से हुए दहशत के दिन
अम्न के बादल हैं अब छाए बहुत
आपके नखरे , हसीं तेवर 'कँवल'
हिज़्र के मौसम में याद आए बहुत
सृजन : 13 अक्टूबर,2025
फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन
फ़ेस बुक पर 15 अक्टूबर,2025 को पोस्टेड