#ग़ज़ल2025@रमेश ‘कँवल’69
जेब में पैसे नहीं,इक ख्वाब है
शहरे-नौ तुमको मेरा आदाब है
फ़िक्र है जनता के सुख दुख की जिसे ये मेरा रहबर बड़ा नायाब है
खिल रहा है देश में हर सू कमल देखिए क्या ख़ुशनुमा तालाब है
फ़िक्र क्यों दुनिया के तानों का करूँ जब करमफ़रमा मेरा अरबाब है
अब इनायत आप भी कुछ कीजिए
आपसे मिलने को दिल बेताब है
तीरगी में भी चमकते हैं दिए
रात है,तारे है इक महताब है
देखिए कैसे किनारे पर मिलें
दो शनावर हैं कठिन गिर्दाब है
वक़्त ने ठोकर लगाए हैं कँवल
फिर भी चेहरा आपका शादाब है
सृजन - 25 नवंबर, 2025